वो शरीफ लौंडे

हिंदुस्तान की परेशानी ये नहीं हैं की यँहा लोग अलग -अलग भासा (launguage ) बोलते हैं या अलग -अलग दीखते हैं . यँहा परेशानी ये है की यँहा एक वक्त में अलग -अलग जेनेरेशन में जी रहे होते हैं. दिल्ली में बड़ा हुआ लौंडा और और बिहार में हमारे गाँव में बड़ा हुए लौंडे में ४ जनरेशन का गैप तो पका है. बात है की बीना एक्सपोज़र के एजुकेशन पूरा नहीं हो सकता, पर बात है की जब रिजर्वेशन दे हीं रही है सरकार तो एजुकेशन का लोडे का है वैसे भी आधा सब ऐसे भी खुश है .

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पर जब हमारे गाँव बाला लौंड़वा जिसके दारू पिए से ओकर पूरा खानदान के नाक कट जा हई, देल्ही आवेगा तो वो है तो बहुत सरीफ पर उसके नजर में सुता फुके वाली , दारू पिए वाली , रात में लड़का के साथ घूमे वाली के तो ऐसे हीं कोई इज्जत नहीं है. आप चाहे लाख कहे इससे हमे क्या ? पर उस सरीफ लौंडे का ये मानसिक स्थीती बहुत बड़ा रिस्क है और खतरनाक भी. अगर महिला सुरच्छा चाहिए तो उसको एजुकेशन और एक्सपोज़र देना जरूरी है. लोग अपने -अपने तरीके से जीने के लिए आजाद हैं और सब के जीने के तरीके का समान हो. पर ये जरूरी है की सब को पता हो की जीने के और तरीके भी हैं….

और हाँ वो पिंक जैसा मूवी नहीं देखता…………..

शब्दो पे नही, भावनाओ पे जाने का और अभी तो शरीफ लौंडे की पूरी कहानी है ,अभी तो वो इंजीनियरिंग कॉलेज जायेगा, प्यार में पड़ेगा और दुबिधा में भी , बहुत मजा है .  सुनना हो तो पेज लाइक करे ..

 

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